रविवार, 24 मई 2020

चिड़िया की चौथी बात

 राजा विशाखदत्त के महल में एक सुंदर वाटिका थी। वाटिका में अंगूरों की एक बेल लगी थी। वहां रोज एक चिड़िया आती और वाटिका में घूमती। अंगूर की बेलों से वह चुन - चुनकर मीठे अंगूर खा जाती और अधपके खट्टे अंगूर नीचे गिरा देती। माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की , पर वह हाथ नहीं आई। माली ने राजा को यह बात बताई। यह सुनकर राजा ने चिड़िया को सबक सिखाने की ठान ली,  

   
 उस दिन वाटिका में घूमते हुए जब चिड़िया अंगूर खाने आई , तो राजा ने उसे पकड़ लिया। वह चिड़िया को मारने लगा , तो चिड़िया ने कहा , हे राजन , मुझे मत मारो। मैं आपको ज्ञान की चार बातें बताऊंगी राजा ने कहा , जल्दी बता। चिड़िया बोली , हाथ आए शत्रु को छोड़ना नही चाहिए , असंभव बात पर भूलकर भी विश्वास मत करना और बीती बातों पर कभी पश्चाताप मत करना।  फिर वह थोड़ा रुकी। राजा ने कहा , चौथी बात भी बता दो। चिड़िया बोली , चौथी बात गूढ़ है। मुझे जरा ढीला छोड़ दें , क्योंकि मेरा दम घुट रहा है। राजा ने हाथ ढीला किया , तो चिड़िया उड़कर एक डाल पर बैठ गई और बोली , मेरे पेट में दो हीरे हैं। यह सुनकर राजा पश्चाताप में डूब गया। राजा की हालत देख चिड़िया बोली , हे राजन , ज्ञान की बात सुनने और पढ़ने से लाभ नहीं होता , उस पर अमल करने से होता है।आपने मेरी बात नहीं मानी। मैं आपकी शत्रु थी , फिर भी आपने मुझे छोड़ दिया। मैंने असंभव बात कही कि मेरे पेट में दो हीरे हैं। फिर भी आपने भरोसा कर लिया।

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