शुक्रवार, 22 मई 2020

परोपकार से पुण्य

  • राजगृह में एक बुद्धिमान सेठ रहता था ।उसकी पत्नी का निधन हो गया था ।उसकी चार पुत्रवधुएं थीं ।सेठ ने सोचा , क्यों न इन चारों वधुओं को परखकर किसी एक को घर की जिम्मेदारी सौंप दी जाए। एक दिन उसने चारों बहुओं को पास बुलाया और कहा , तुम चारों को मैं धान के पांच - पांच दाने देता हूं ।इन्हें संभालकर रखना और जब मैं मांगू , उन्हें लौटा देना ।बड़ी बहू ने सोचा कि कोठार में धान भरा हुआ ही है , जब ससुर जी मांगेगे , तो वहां से पांच दाने लाकर दे दूंगी ।उसने दाने कूड़े में फेंक दिए ।दूसरी ने भी यही सोचा ।तीसरी कुछ समझदार थी ।उसने दानों को रेशमी कपड़े में बांधा और रत्नों से भरी पेटिका में रख दिया ।चौथी नेसत्संग में सुना था कि कोई भी सत्कर्म करने से बड़ते हैं , इसलिए उसने पांचों दानों को खेत में बो दिया ।उससे जो फसल पैदा हुई , उसने उन्हें फिर से खेत में रोप दिया ।इस तरह कुछ ही वर्षों में उसके पास इतना धान हो गया कि उसका कोठार भर गया ।पांच वर्ष बाद सेठ ने बहुओं से दाने मांगे ।शुरू की तीन बहुओं ने दाने वापस कर दिए , पर चौथी ने सारी बात बताकर कहा , पिताजी , वे पांच दाने कोठार में बंद हैं और मैं उसे लाने में असमर्थ हूं ।सेठ प्रसन्न हुआ और उसने बहुओं से कहा , जिस प्रकार धान बोने से बढ़े हैं , उसी प्रकार सेवा -परोपकार से पुण्यबढ़ते हैं  उसने छोटी बहू को घर की मालकिन बना दिया । 

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