सोमवार, 17 मई 2021

मुनि का विवेक

 एक व्याध देविका नदी के तट पर तपस्या कर रहा था । दुर्वासा ऋषि वहां आ पहुंचे । उन्होंने नदी में स्नान किया तथा तट पर बैठकर पूजा अर्चना की । दुर्वासा जी को भूख बहुत सताती थी । व्याध ने वनदेवियों से शुद्ध आहार तैयार कराकर दुर्वासा जी कोभोजन कराया । दुर्वासा ऋषि ने तृप्त होकर वर दिया , तुम सत्यतपा ऋषि के नाम से ख्याति प्राप्त करोगे । इंद्र व विष्णु तुम्हारी परीक्षा लें , तब भी तुम सत्य पर अडिग रहोगे । एक दिन सत्यतपा ऋषि वन में बैठे थे । अचानक एक वराह सामने सेगुजरा और ओझल हो गया ।पीछे - पीछे शिकारी पहुंच गया । उसने मुनि से पूछा , क्या तुमने वराह को जाते देखा है ? मुनि ने सोचा कि वह सच बताता है , तो शिकारी वराह को मार देगा । यदि नहीं बताता , तो शिकारी का परिवार भूखा रह जाएगा । मुनि ने कहा , वराह को आंखों ने देखा है , पर वे बोल नहीं सकतीं । जिह्वा बोल सकती है , किंतु उसने वराह को देखा नहीं । तभी मुनि ने देखा कि सामने शिकारी की जगह विष्णु और इंद्र खड़े हैं । उन्होंने कहा , मुनिवर , वास्तव में तुम सत्य-असत्य के रहस्य व उसके परिणाम को समझते हो, सत्य बोलते समय उसका परिणाम क्या होगा , यह विवेक ही उचित निर्णय ले सकता है । सत्यतपा मुनि को वर देकर दोनों लौट गए ।

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

समस्याओ का समाधान करें

 एक प्रोफेसर ने हाथ में पानी के गिलास को दिखाया और पूछा कि आपको कितना लगता है कि ग्लास का वजन कितना होगा ?किसी ने कहा 50 ग्राम , किसी ने कहा 100 ग्राम , आदि । तब प्रोफेसर ने कहा कि जब तक मैं इसका वजन नहीं कर सकता , मैं इसका सही वजन नहीं बता सकता । लेकिन मेरा सवाल यह है कि अगर मैं इस ग्लास को थोड़ी देर के लिए पकड़ कर रखू तो क्या होगा ? छात्रों ने कुछ नहीं कहा । फिर प्रोफेसर ने पूछा , अच्छा , अगर मैं इसे इस तरह एक घंटे तक रखू तो क्या होगा ? तब एक छात्र ने कहा , आपका हाँथ दर्द करने लगेगा ।प्रोफेसर आप सही कह रहे हैं , ठीक है अगर मैं इसे पूरे दिन ऐसे ही रखता हूँ, तो क्या होगा ?

  पढ़े:- चिड़िया की चौथी बात

                        जहां एक छात्र ने कहा कि यह आपके हाथ को सुन्न कर सकता है , आपकी मांसपेशियों को बहुत अधिक तनाव हो सकता है , लकवा मार सकता है और निश्चित रूप से आपको अस्पताल जाना पड़ सकता है । उसकी बात सुनकर बाकी छात्र हंस पड़े । प्रोफेसर ने पूछा , " बहुत अच्छा , लेकिन क्या इस दौरान ग्लास का वजन बदल गया ? " छात्रों ने उत्तर दिया '  नहीं ।

फिर उन्होंने कहा , फिर मेरे हाथ में दर्द और मांसपेशियों में तनाव क्यों था ? छात्र हैरान थे । तब प्रोफेसर ने पूछा , दर्द से छुटकारा पाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ? एक छात्र ने कहा कि गिलास को नीचे रख देना चाहिए । प्रोफेसर ने कहा , बिल्कुल सही !!              हमें भी अपने जीवन की समस्याओं को झेलने की बजाय उसका समाधान करना चाहिए ।

मंगलवार, 16 मार्च 2021

राजा के कुर्ते का बटन

 एक राजा अपनी प्रजा का हाल - चाल जानने के लिए गांव घूम रहा था । घूमते - घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया । राजा ने मंत्री से कहा , पता करो कि इस गांव में कौन दर्जी है , जो मेरे कुर्ते का बटन लगा सकता है । मंत्री को पता चला कि गांव में एक ही दर्जी है , जिसका नाम है सुखीराम । उसे राजा के सामने ले जाया गया । राजा ने कहा कि तुम मेरे कुर्ते का बटन लगा सकते हो ? सुखीराम ने कहा , " हुजूर यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है , यह कार्य तो मैं रोज करता हूं । " सुखीराम ने एक बटन लिया और धागे से राजा के कुर्ते का बटन लगा दिया । टूटा हुआ बटन राजा के पास ही था , इसलिए दर्जी को केवल अपने धागे का इस्तेमाल करना पड़ा राजा ने दर्जी से पूछा , " कितने पैसे दूं ? " उसने कहा

                 महाराज , रहने दो ।" राजा फिर दर्जी से कहा , " बोलो , कितनी मुद्राएं दूं ?" सुखीराम ने सोचा कि दो रुपये मांग लेता हूं । फिर मन में सोचा कि कहीं राजा यह न सोच ले यह बटन लगाने के बदले में मुझसे दो रुपये ले रहा है , तो गांव वालों से कितना लेता होगा ? उसने राजा से कहा कि महाराज , आपको जो भी उचित लगे वह दे दो । राजा ने मंत्री से कहा , इस दर्जी को दो गांव दे दो । कहां दर्जी सिर्फ दो रुपये की मांग कर रहा था और कहां राजा ने उसे दो गांव दिए सुखीराम ने प्रसन्नतापूर्वक दोनों गांव की जागीर कुबूल कर ली । इसलिए जो संतोषी होते हैं और सच्चाई पर रहते हैं , जिंदगी में खुशियां उनके पास ही आती हैं

मंगलवार, 26 मई 2020

और मेढक ने कोशिश जारी रखी



एक बार की बात है । बहुत से मेढक जंगल से गुजर रहे थे । वे सभी आपसी बातचीत में कुछ ज्यादा ही मशगूल थे । तभी उनमें से दो मेढक एक गड्ढे में गिर पड़े । बाकी मेढकों ने देखा कि उनके दो साथी गहरे गड्ढे में गिर गए हैं , तो वे भागने लगे । गड्ढा गहरा था और इसलिए बाकी साथियों को लगा कि अब उन दोनों का गड्ढे से बाहर निकल पाना मुश्किल है । साथियों ने गड्ढे में गिरे उन दोनों मेढकों को आवाज लगाकर कहा कि अब तुम खुद को मरा हुआ मानो । इतने गहरे गड्ढे से बाहर निकल पाना असंभव है । दोनों मेढकों ने बात को अनसुना कर दिया और बाहर निकलने के लिए कूदने लगे । बाहर झुंड में खड़े मेढक उनसे चीखकर कहने लगे कि बाहर निकलने की कोशिश करना बेकार है । अब तुम बाहर नहीं आ पाओगे । थोड़ी देर तक कूदा - फांदी करने के बाद भी जब दोनों मेढक गड्ढे से बाहर नहीं निकल पाए तो एक मेढक ने आस छोड़ दी और वह गड्ढे में और नीचे की तरफ लुढ़क गया । नीचे लुढ़कते ही वह मर गया । दूसरे मेढक ने कोशिश जारी रखी और अंततः पूरा जोर लगाकर एक छलांग लगाने के बाद वह गड्ढे से बाहर आ गया । जैसे ही दूसरा मेढक गड्ढे से बाहर आया तो बाकी मेढक साथियों ने उससे पूछा ,
“ जब हम तुम्हें कह रहे थे की गड्ढे से बाहर आना संभव नहीं है , तब भी तुम छलांग मारते रहे , क्यों ? "
" इस पर उस मेढक ने जवाब दिया , " दरअसल , मैं थोड़ा - सा ऊंचा सुनता हूं और जब मैं छलांग लगा रहा था , तो मुझे लगा कि आप मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं । इसलिए मैंने कोशिश जारी रखी और देखिए , मैं बाहर आ गया ।" 
मेढक की तरह ही व्यक्ति को आखिरी सांस तक कोशिश जारी रखनी चाहिए । तभी अंत में विजय उसके कदम चूमती है ।

रविवार, 24 मई 2020

चिड़िया की चौथी बात

 राजा विशाखदत्त के महल में एक सुंदर वाटिका थी। वाटिका में अंगूरों की एक बेल लगी थी। वहां रोज एक चिड़िया आती और वाटिका में घूमती। अंगूर की बेलों से वह चुन - चुनकर मीठे अंगूर खा जाती और अधपके खट्टे अंगूर नीचे गिरा देती। माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की , पर वह हाथ नहीं आई। माली ने राजा को यह बात बताई। यह सुनकर राजा ने चिड़िया को सबक सिखाने की ठान ली,  

   
 उस दिन वाटिका में घूमते हुए जब चिड़िया अंगूर खाने आई , तो राजा ने उसे पकड़ लिया। वह चिड़िया को मारने लगा , तो चिड़िया ने कहा , हे राजन , मुझे मत मारो। मैं आपको ज्ञान की चार बातें बताऊंगी राजा ने कहा , जल्दी बता। चिड़िया बोली , हाथ आए शत्रु को छोड़ना नही चाहिए , असंभव बात पर भूलकर भी विश्वास मत करना और बीती बातों पर कभी पश्चाताप मत करना।  फिर वह थोड़ा रुकी। राजा ने कहा , चौथी बात भी बता दो। चिड़िया बोली , चौथी बात गूढ़ है। मुझे जरा ढीला छोड़ दें , क्योंकि मेरा दम घुट रहा है। राजा ने हाथ ढीला किया , तो चिड़िया उड़कर एक डाल पर बैठ गई और बोली , मेरे पेट में दो हीरे हैं। यह सुनकर राजा पश्चाताप में डूब गया। राजा की हालत देख चिड़िया बोली , हे राजन , ज्ञान की बात सुनने और पढ़ने से लाभ नहीं होता , उस पर अमल करने से होता है।आपने मेरी बात नहीं मानी। मैं आपकी शत्रु थी , फिर भी आपने मुझे छोड़ दिया। मैंने असंभव बात कही कि मेरे पेट में दो हीरे हैं। फिर भी आपने भरोसा कर लिया।

जहां चाह वहीँ राह

एक बार एक राज्य में वर्षा न होने के कारण अकाल पड़ गया .
           राजा दयालु एव उदार था उसने अपने भण्डार में एकत्र खाद्य सामग्री को निःशुल्क वितरित कराना आरम्भ कर दिया . 
     एक किसान ने सोचा - क्या वर्षा के अभाव में खेती करना सम्भव हो सकता है ? 

उसने निःशुल्क अन्न लेना अस्वीकार कर दिया और राज्य की सीमा में स्थित एक तालाब से पानी ला - लाकर खेत को सींचना आरम्भ कर दिया ।
          कुछ दिनों में तालाब का पानी समाप्त हो गया . किसान हताश नहीं हुआ . उसने नदी से पानी लाकर खेत की सिंचाई करने की योजना बनाई . 
        उसके कार्य में पूरा परिवार तो सहयोगी था ही . तीन दिन तक किसान और उसके परिवारीजन नदी से पानी भरकर लाते रहे . संयोग की बात रात में वर्षा हो गई।
       राजा ने किसान को बुलवाया , उसकी प्रशंसा की और उसको पुरस्कृत करते हुए कहा - किसी ने ठीक ही कहा है - जहाँ चाह है , वहाँ राह है . 
             परमात्मा ने हमको इच्छा शक्ति का वरदान दिया है . फलतः हम स्वतन्त्र रूप से निर्णय करने के लिए तथा इच्छित रूप में पुरुषार्थ करने के लिए स्वतन्त्र हैं ।
       प्रकृति भी चाहती है कि हम प्रत्येक अवसर पर , विशेषकर किसी समस्या के उपस्थित होने पर , अपनी इच्छा शक्ति की सहायता से अपना मार्ग निर्धारित करने का अभ्यास करें ।

शुक्रवार, 22 मई 2020

जीभ और दांत

चीन के दार्शनिक कन्फ्यूशियस के जीवन के अंतिम दिन अनेक शिष्य उनके अंतिम दर्शन के लिए उनके पास पहुंचे ।उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को शैया के बिल्कुल पास बुलाया तथा अपना मुंह खोलकर कहा , गौर से देखो , मुंह में जीभ है या नहीं ?शिष्य ने उत्तर दिया , मुंह में जीभ है ।उन्होंने दूसरा प्रश्न किया , गौर से देखो और बताओ कि मेरे मुंह में दांत हैं कि नहीं ?शिष्य ने खुला हुआ पोपला मुंह देखकर कहा , दांत तो एक भी नहीं है ।कन्फ्यूशियस ने कुछ क्षण रुककर कहा , जीभ मेरे पैदा होने के समय थी और आज भी है ।दांत मेरे मुंह में बाद में आए और आज एक भी दांत मेरे मुंह में नहीं है ।इसका कारण जानते हो , क्या है ?कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने खुद ही बताया , जीभ कोमल और मीठी वाणी बोलने वाली है ।इसलिए यह जीवन के अंतिम क्षणों तक भोजन - पानी से शरीर को पुष्ट करती रहती है और शरीर का अभिन्न अंग बनी रहती है ।दांत कठोर पदार्थ के बने होते हैं , इसलिए वे छत्तीस होते हुए भी शरीर का अभिन्न अंग नहीं बन पाते हैं ।
इससे यही शिक्षा लो कि तुम सभी जीभ की तरह कोमल और सरस बनकर अंतिम समय तक अपने देश और समाज की सेवा करते रहोगे ।
इतना कहने के बाद कन्फ्यूशियस ने अपनी आंखें मूंद लीं ।उनके शिष्यों ने गुरु के बताए उपदेश का पालन करने का संकल्प लिया ।